चकाचौन्ध

शहर की चकाचौन्ध में वो एक कोने में ही दुबका रहता - अपने पर से विश्वास खोने लगा था। एक रात पता नहीं क्या सोचा, बस उड़ पड़ा। शहर गुज़रा, क़स्बा आया - क़स्बा गुज़रा, गाँव आया - रुका तो देखा कि अँधेरा गाँव उसकी रौशनी से अभिभूत था।

बनावटी बिजलियों से दूर आ कर ही, वो जुगनू खुद का मोल जान पाया था

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